फिर उस गली की तरफ खुद-ब-खुद उठे हैं कदम,

जहाँ से रोज़ नये ज़ख्म खा के आते हैं।।

पराई आग बुझाने को जा रहे हैं लोग,

अभी सब अपनी हथेली जलाके आते हैं।।।।

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